आसिफ उर्फ अक्षय कुमार अभिनीत हिन्दी फिल्म लक्ष्मी अपने दूसरे दिन ही सुपर फ्लॉप साबित हो गई। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ हुई इस फिल्म को अब तक जीतने भी लोगों ने देखा है वे अक्षय कुमार के साथ-साथ डिज्नी प्लस हॉटस्टार को भी कोस रहे हैं। यह फिल्म राघव लॉरेंस के निर्देशन में बनी साउथ की सुपरहिट फिल्म “कंचना” का रिमेक है। अक्षय कुमार ने इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने के साथ-साथ इसे प्रोड्यूस भी किया है। फिल्म के अन्य कलाकारों में कियारा आडवाणी, शरद केलकर, अश्विनी कलेस्कर, मनु ऋषि और आयशा राज शामिल हैं।

दरअसल जनता की गाढ़ी कमाई के बल पर सुपर हीरो बने फिल्मी सितारों को जब यह लगने लगता है कि वे भगवान बन गए हैं, तो यह जनता ही उन्हें एक झटके में सड़क पर ला कर खड़ा कर देती है। 

अक्षय कुमार ने शायद सोचा था कि दीवाली पर अगर फिल्म के नाम के साथ बम लगा दिया जाए तो फिल्म सुपर हिट हो जाएगी। बाद में उन्हें फ़िल्म का टाइटल ‘लक्ष्मी बोंब’ से ‘लक्ष्मी’ करना पड़ा। उन्होंने फिल्म का नाम बदलने के स्थान पर अपने अभिनय और स्क्रिप्ट पर मेहनत की होती तो शायद फिल्म थोड़ी बहुत चल सकती थी। शायद लेकिन उन्हें लगा कि जिस तरह मुसलमान थोक में वोट देकर किसी को भी जीता सकते हैं, उसी तरह मुस्लिम कम्यूनिटी और लिबरल मिलकर उनकी फिल्म भी हिट करा देंगे।

लेकिन देश के हिंदुओं में अब जागृति आनी आरंभ हो गई है और उन्हें समझ आने लगा है कि किस तरह बरसों से बॉलीवुड अपनी फिल्मों में हिन्दू धर्म और संस्कृति को लगातार बदनाम कर रहा है।

कहानी

फिल्म की शुरुआत में हमें पता चलता है कि रश्मि (कियारा आडवाणी) एक हिन्दू लड़की है जो तीन साल पहले आसिफ (अक्षय कुमार) के साथ भाग कर शादी कर चुकी हैं। हालांकि मिया-बीबी दोनों आराम से रह रहे हैं लेकिन रश्मि के माँ-बाप ने इस रिश्ते को शादी के तीन साल बाद भी नहीं स्वीकारा है। आसिफ का एक भाई भी था जिसकी एक एक्सीडेंट में मौत हो गई थी। इस एक्सीडेंट में आसिफ कि भाभी भी मारी गई और अब उनका बच्चा, शान, आसिफ और रश्मि के साथ रह रहा है।

हालांकि फिल्म में इस बच्चे का कुछ खास रोल नहीं है लेकिन थोड़ी देर में समझ आ जाता है कि इस किरदार को एक खास मकसद के लिए गढ़ा गया था। फिल्म में भूतों की एंट्री होते ही इस बच्चे का किरदार भी खत्म हो जाता है लेकिन बच्चा लिबरलों को खुश करने के लिए यह कहने से नहीं चुकता है कि “वो अभी भी हिन्दू-मुसलमान में अटके हुए हैं”। ये वो तब कहता है जब आसिफ़ उसे बताता है की रश्मि के परिवार वाले उसे मिले बिना ही नकार चुके हैं।

मतलब साफ है कि अक्षय कुमार के अनुसार हिन्दू अभी भी रूढ़िवादी हैं और अपनी जवान बेटी का एक मुसलमान के साथ रहना सहन नहीं कर पा रहे हैं। हिन्दू अभी भी पुरुषवादी हैं और अपनी बेटी की खुशी बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं, भले ही उनकी 21 साल की बेटी को यह खुशी 50 साल के अधेड़ (मुसलमान) के साथ शादी कर हासिल हुई हो।

एक सीन में आसिफ एक हिन्दू तांत्रिक को धोखेबाज साबित करता है। यह तांत्रिक तथाकथित रूप से लोगों को प्रेत-आत्माओं का डर दिखा कर लूटता है। इस सीन से फिल्म की कहानी ऐसा मोड़ ले लेती है जिसके बाद फिल्म में सिर्फ यह सिद्ध करने का प्रयास शुरू हो जाता है कि हरा रंग भगवे रंग से कहीं बेहतर है।  

एक नाबालिग हिन्दू लड़का जब लड़कियों जैसी हरकतें करने लगता है तो उसके हिन्दू माँ-बाप उसे त्याग कर परिवार से अलग कर देते हैं। उसे बच्चे को एक “परोपकारी” अब्दुल चाचा गोद ले लेते हैं और उसे एक किन्नर का “सम्मानजनक” जीवन देते हैं। यही किन्नर जब एक “मंदिर” में हो रही छेड़छाड़ को रोकने के लिए मारपीट करता है तो “अब्दुल चाचा” उसे झगड़ा करने से रोकते हैं। जहां एक ओर “भगवाधारी साधु” किन्नर में से लक्ष्मी का भूत निकालने में नाकामयाब रहते हैं, वहीं दूसरी ओर “मुस्लिम” पीर-फकीर इसी काम को बड़ी आसानी से कर देते हैं। लक्ष्मी का भूत अपने हत्यारों से बदला लेने के लिए मंदिर में घुसने में नाकामयाब रहता है तो वह किन्नर “आसिफ” का सहारा लेता है और कामयाब हो जाता है।

अगर हम राघव लॉरेंस द्वारा निर्देशित ओरिगिनल फिल्म “कंचना” को देखे तो लक्ष्मी के मुक़ाबले बहुत अलग नज़र आती है।

लगता है जैसे इसके हिन्दी रूपान्तरण में अपना हिन्दू विरोधी एजेंडा प्रचारित करने के लिए लक्ष्मी के निर्माताओं ने फिल्म की कहानी को पूरी तरह बदल डाला। आइए देखते हैं कि किस तरह खुद को लिबरल सिद्ध करने के लिए अक्षय कुमार ने फिल्म की कहानी में बदलाव किए हैं:

  • “कंचना” में फिल्म के नायक का नाम राघव है जो अपना सारा समय बच्चों के साथ क्रिकेट खेलने और अपनी बहन की ननद प्रिया को रिझाने में बिताता है। दूसरी ओर लक्ष्मी का नायक आसिफ एक हिन्दू लड़की रश्मि से शादी करता है। फिल्म के अंतिम हिस्से में रश्मि के पिता को अहसास होता है कि उसने आसिफ को स्वीकार न करके बहुत बड़ी भूल की है।
  • कंचना में जब राघव को भूतों से डर लगता है तो वह हिन्दू भगवानों का स्मरण करता है जबकि लक्ष्मी में आसिफ हिन्दू साधुओं को ढोंगी साबित करने में अपना समय लगता है। फिल्म के एक गाने में आसिफ भूतों के कपड़े खींच देता है।  इस सीन में भूतों के अंदरूनी कपड़े ‘भगवा’ दिखाए गए हैं।
  • कंचना में नाबालिग किन्नर लड़के को गोद लेने वाला मुस्लिम शख़्स शराबी है जबकि इसके हिन्दी वर्जन में नायिका रश्मि की माँ शराबी है पर अब्दुल चाचा सिर्फ़ चाय ही पीता है।
  • कंचना में एक हिन्दू स्कूल प्रिंसिपल किन्नर लड़के को पढ़ाई लिखाई में आर्थिक रूप से मदद करते हैं और उसे एक सम्मानजनक जीवन देने का प्रयास करते हैं। जबकि लक्ष्मी में इस तरह का कोई भी किरदार नहीं हैं। यहाँ किन्नर की मदद के लिए केवल एक ही व्यक्ति सामने आता है और वे हैं “अब्दुल चाचा”।
  • ओरिजनल फिल्म कंचना में किन्नर एक भगवान का भक्त है और जिस समय उसे पता चलता है कि उसकी जमीन हड़प ली गई है वह भगवान की पूजा कर रहा होता है। हिन्दी फिल्म “लक्ष्मी” में इस सीन को ही गायब कर दिया गया है।
  • कंचना में खलनायक परिवार एक साधु के पास जाते हैं जो सफ़ेद कपड़े पहने हुए है। लक्ष्मी के निर्माताओं ने यहाँ अपने हिन्दू विरोधी एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए साधु को भगवा वस्त्र पहनायें हैं जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में “जय श्री राम” लिखा है। यहाँ “भगवाधारी साधु” यह जानते हुए भी कि उसकी शरण में आए पति पत्नी अपराधी हैं, उनकी मदद के लिए सहर्ष तैयार हो जाता है।
  • कंचना फिल्म के क्लाइमेक्स सीन में किन्नर का भूत मंदिर में घुसने से पहले नरसिंह भगवान से विनती करता है और कहता है कि यदि वह (किन्नर) अधर्मी है तो उसे नरसिंह भगवान जला कर राख कर दें और यदि वह सही है तो उसे मंदिर में प्रवेश करने दें। इसके बाद नरसिंह भगवान उसे मंदिर में प्रवेश करने की आज्ञा दे देते हैं। किन्नर का भूत मंदिर में प्रवेश करता है लेकिन मंदिर कि पवित्रता को बचाए रखने के लिए खलनायक को मंदिर से बाहर निकाल कर मारता है। अक्षय कुमार (आसिफ) इसी फिल्म के हिन्दी वर्जन में कहते हैं कि मंदिर में लक्ष्मी (किन्नर) नहीं घुस सकती है तो क्या, आसिफ तो आ सकता है। यहाँ आसिफ मंदिर में घुसता है और मंदिर में तोड़फोड़ करने के बाद खलनायक को पीटता है।
  • मूल फिल्म कंचना में जब बुराई पर अच्छाई की जीत हो रही होती है तो पार्श्व में गीता के श्लोक सुनाई देते हैं जबकि लक्ष्मी में ऐसा कुछ भी नहीं है।

अगर हम मूल तमिल फिल्म कंचना को नेहरू स्टाइल का सेक्युलरीस्म कहें तो इसका अक्षय कुमार अभिनीत हिन्दी रूपान्तरण लक्ष्मी जिन्ना के स्टाइल वाला कम्यूनलिस्म है। अगर कंचना की थीम ‘अच्छा हिन्दू-बुरा हिन्दू-अच्छा मुसलमान‘ थी तो लक्ष्मी की थीम ‘बुरा हिन्दू-भयानक हिन्दू-पालनहार मुसलमान’ है।

अक्षय कुमार ने अपने को मुस्लिम परस्त सेक्युलर सिद्ध करने के लिए बड़ी चतुराई से ओरिजिनल फिल्म कंचना के वे सारे सीन हटा दिए जहां हिन्दू धर्म की अच्छाइयों को दिखाया गया था।

कुल मिला कर लक्ष्मी एक ऐसी फिल्म है जिसे बनाने के पीछे केवल एकमात्र उद्देश्य यह रहा है कैसे मुसलमानों को हिंदुओं से बेहतर साबित किया जाए।    

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