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फिल्म ‘द ज़ोया फैक्टर’ में अभ्यास की जगह नारियल फोड़ता पंडित केवल अंधविश्वास और उपहास का पात्र है
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फिल्म 'द ज़ोया फैक्टर' में अभ्यास की जगह नारियल फोड़ता पंडित केवल अंधविश्वास और उपहास का पात्र है
यही उर्दूवुड दुआ और ताबीज़ से हारी हुई बाज़ी पलटते हुए गर्व से दिखाता है
आस्था के चित्रण में यह भेद क्यों कि हिन्दू विश्वास मतलब उपहास और बाकी सब इबादत?






