अपनी ही संस्कृति का बेशर्मी से उपहास करने वाली वेब सिरीज़ “आश्रम” का दूसरा सीजन अब नेटफ्लिक्स पर प्रसारित हो रहा है।  इस वेब सीरीज को प्रकाश झा ने लिखा है। हिन्दी फिल्मों में लगातार असफल होने के बाद अब छोटे पर्दे पर किस्मत आजमा रहे बॉबी देओल इस वेब सीरीज में एक ऐसे मठाधीश की भूमिका निभा रहे हैं जो महिलाओं की इज्जत लुटता है।

हम महिलाओं पर अत्याचार करने वाले और लोगों की धार्मिक भावनाओं का लाभ उठा कर उन्हें लूटने वाले ढोंगी बाबाओं का विरोध करते हैं मगर साथ ही यह भी कहना चाहते हैं कि चाहे फिल्में हो या टीवी सीरियल, इन तथाकथित लिबरलों और अभिव्यक्ति की आजादी के ठेकेदारों के निशाने पर हर बार हिन्दू ही क्यों होते हैं।  प्रकाश झा, महेश भट्ट और इन जैसे लोगों को न जाने क्यों मदरसों और चर्चों में होते छोटे-छोटे कच्ची उम्र के अबोध बालक-बालिकाओं से लेकर बहन-बेटियों का यौन शोषण कभी दिखाई नहीं दिया। 

जेम्स ऑफ बॉलीवुड द्वारा लगातार तथ्यों के आधार पर यह साबित किया जा रहा है कि जानबूझ कर वर्षों से वामपंथी विचारधारा वाले कलाकारों और साहित्यकारों द्वारा अपनी फिल्मों, किस्से कहानियों और सीरियलों द्वारा एक सोची समझी साजिश के तहत हिन्दू धर्म को ही बदनाम किया जा रहा है।   

आश्रम वेब सीरीज के प्रोड्यूसर और डायरेक्टर प्रकाश झा हैं। इसके क्रिएटिव प्रोड्यूसर तेजपाल सिंह रावत हैं और एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर गौतम तलवार हैं। इस वेब सीरीज में बॉबी देयोल (बाबा निराला) के अलावा चन्दन रॉय सन्याल (भोपा स्वामी) और अदिति सुधीर पोहनकर (पम्मी) ने प्रमुख भूमिकाएँ निभाई है। इस वेब सीरीज के लेखकों में माधवी भट्ट, अविनाश कुमार, संजय मासूम और कुलदीप रुहिल का भी सहयोग रहा है।  

प्रकाश झा की मानें तो हिन्दू आश्रमों की केयर टेकर अपने खाली समय में अश्लील फिल्में देखती हैं, जबकि रिसर्च से पता चलता है कि दूसरे धर्मों के लोग इंटरनेट पर अपेक्षाकृत ज्यादा अश्लील साहित्य सर्च करते हैं।

इसी तरह एक कड़ी में दिखाया गया है कि स्वर्ण जाति के एक दबंग ने दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने के लिए पीट दिया।  हालांकि दुर्भाग्य से देश के अनेक हिस्सों में इस तरह की घटनाएँ हो चुकी हैं लेकिन मुस्लिम समाज के दबंग भी दलितों के साथ छोटी-छोटी बातों के लिए मारपीट करते हैं जो इन फिल्म निर्माताओं और लेखकों की नज़रों से बचे रहते हैं।

सीरीज में हिन्दू धर्म को टार्गेट करते हुए आश्रम को ही ड्रग का अड्डा दिखाया गया है। जबकि हम सब जानते हैं कि निज़ामुद्दीन जैसे अनेक मुस्लिम इलाके ड्रग सप्लायरों और आतंकवादियों की पनाहगार बने हुए हैं।

इसी तरह से सीरीज में बलात्कार के समय पार्श्व में जानबूझ कर संस्कृत श्लोकों और मंत्रों का जाप दिखाया जा रहा है।

हम यह नहीं कह रहे हैं कि साधु और मठाधीश ढोंगी नहीं होते हैं लेकिन ऐसे टीवी सीरियलों और फिल्मों के माध्यम से यह सिद्ध करने की कोशिश हो रही है कि ठोंगी और पाखंडी साधु सिर्फ हिन्दू समाज में ही होते हैं।  ऐसी फिल्में आम जन मानस के मस्तिष्क में हिन्दू धर्म और साधु-महात्माओं की गलत छवि प्रस्तुत करती है जिसके परिणाम स्वरूप पालघर जैसी घटनाएँ घटित होती रहती है।

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